सच और झूठ

अधूरे सच और झूठ का साथ,
पछतावे के सिवा, लगे न  कुछ हाथ।

सीता पर लान्छन् लगा, जब था राम राज
सच को आज भी मार पड़े, और झूठ करे राज।

जिसको समझे अपना, वो भी साथ न दे
डूबते हो मझधार में ,तो हाथ न दे।

झूठ की जमीं पर ,यूँ सच की इमारत न बनाओ
यही कहीं बैठा हैं ईश्वर ,यूँ नजरे ना छिपाओ।।

                          संगीता दरक ©

आजकल लोग

धुँआ उठता देख आजकल लोग ,
पानी नहीं तलाशते
बस आग को हवा देते हैं 
आग सुलगती रहे, और तमाशा चलता रहे
फिर चाहे जो जलता रहे ,
बस धुँआ उठता रहे
                संगीता दरक ©

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 अरावली यह धरती और अम्बर पर्वत पहाड़ नदियाँ समंदर जाने कब कितने दिनों से  बिना कुछ लिए, भेदभाव किए जीवन देते हमको भरपूर हम क्या नापें        ...