मन
मन सुबह आँख खुलते ही अश्व की गति से ऐसा भागता है पता नही कितनी योजनाएं
बनाता ओर कितने ही जनों को लेकर ख्याल बुनता रहता
ऐसा लगता मानो रात को हम ने सभी को कहकर सुलाया हो की सुबह मिलते है और और सुबह होते ही सब मन के साथ जाग गए
क्या आपने कभी सोचा है हमें खुद को समझने के लिए किसी और का सहारा लेना पड़ता है ऐसा क्यों होता है
क्यों हम अपनी खुद की बात नहीं मानते हैं क्यों हमें हमेशा हर कोई तीसरा चाहिए होता है अपने आप
को समझने के लिए कभी हम बुक्स पढ़ते हैं अच्छी तो सोचते हैं इससे हम सुधरेंगे कभी किसी का मोटिवेशनल स्पीच सुनते हैं तो हम सोचते हैं कि इससे सुधरे लेकिन मन भागता रहता है पता ऐसा क्यों होता है क्योंकि हम दूसरों की बात नहीं हम खुद की बात सुनते हैं कभी आप देखिए सुबह उठते ही अगर आपने सोचा कि हां मुझे उठना है मॉर्निंग वॉक पर जाना है तो अवचेतन मन को अपनी इस बात का संकेत मिल जाता है कि हां मुझे उठना है और यदि हम मन में ठान लेते हैं कि नहीं आज नहीं उठना है आज मुझे मॉर्निंग वॉक नहीं जाना है तो जो पहली लाइन आपने बोली है हां मुझे आज घूमने नहीं जाना है वह अवचेतन मन ने सुन ली तो बस वही होना है आप उठेंगे नहीं और आलस करके फिर सो जाएंगे तो मेरे हिसाब से सबसे ज्यादा हम अपने आप की सुनते हैं और हम इस भ्रम में रहते हैं कि कोई हमें समझाएं तो हम समझे लेंगे
हम जब तक अपने आपके साथ नहीं बैठेंगे तब तक हम नहीं सुधरेंगे नहीं सोचेंगे नहीं समझेंगे।
बस मैं भी सुप्रभात के इंतजार में हूँ
सफर पर तो निकल पड़ी हूँ अँधेरा छटने को है..............
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